जिल्हा
17 जुलाई बुधवार को भंडारा जिला कारागृह जेल के दरगाह मे मोहर्रम के अवसर आयोजित उर्स में शानदार कव्वाली..
पुरातन कालीन वैभव का प्रतीक भंडारा किला जो वर्तमान में भंडारा जेल के रूप में जाना जाता है, इस किले में दरगाह है जहां प्रतिवर्ष मोहर्रम पर वार्षिक बाबा का उर्स आयोजन किया जाता है, 17 जुलाई बुधवार को जेल की दरगाह में शानदार कव्वाली का आयोजन किया है, पहले का किला और वर्तमान जेल का इतिहास इस प्रकार है,(भंडारा) का किला देवगड के गवली राजा द्वारा बांधा गया था.किले के आसपास 7परकोट थे ये सब युद्ध में जीर्ण हो ढह गए होंगे। किले की लंबाई करीब 480 फूट चौड़ाई 400 फूट होकर करीब 11 बुर्ज उस समय होंगे। .फिलहाल 5 बुर्ज है।बुर्जों की ऊंचाई 40 फूट के करीब होकर व्यास 45 फुट तो नीचे का 50 फूट है.पत्थर,चौड़ी ईंटों से बांधा हुआ है. कुछ हिस्सा ढा है। . इतिहास के जानकर मो सईद शेख ने बताया की संकट के समय किले के बाहर जाने का गुप्त भुयारी मार्ग का उपयोग होता था।यहां बड़े खंदक थे.किले पर हरी पाटिल ये वलीशाह के विश्वासपात्र किलेदार थे. यहां कई युद्ध गोंड,भोसले,मराठा में सन 1739 के आसपास हुए.भंडारा के महान संत, वली देवबा साधु ,पिराशा वली इनका आशीर्वाद लेने रघुजी भोसले अक्सर भंडारा आया करते थे ।उनसे आशीर्वाद पाकर उन्होंने अपना मोर्चा और ज्यादा मजबूत किया.देवगढ़ के दीवान रघुनाथ सिंह भी यहां कुछ समय रहे।किले की सीधी तरफ कोने में बाबा चांदशाह वली की दरगाह है. जहाभी किले बने हैं वहा चांद शाह वली की दरगाह तामीर की गई हैं ।मोहर्रम के दिन दशमि को भंडारा की सभी सवारीया यहां आकर ठंडी की जाती है.इसलिए इस दिन ये किला(काराग्रह ) शाम जनता के दर्शनार्थ खुला किया जाता है ।हज़ारों की तादाद में भंडारा,परिसर ,गांवों से लोग यहां आते है,कव्वाली और मेला लगता है। बाबा के उर्स के अवसर पर बुधवार को हजारों श्रद्धालु भंडारा जिला कारागृह जेल के प्रांगण में अपनी हाजरी देंगे ।





