प्रजातंत्र है फिर क्यों परेशान है


संजीव भांबोरे
दिल्ली( ऑल इंडिया प्रतिनिधी) देश का माहौल बीते सालों में इतना बिगड़ गया है की हमें पता ही नहीं चल रहा की हम कैसी सरकार चुने हैं देश आजाद होने के बाद संविधान की संरचना करते हुए हित और अहित के ऊपर बराबर से ध्यान दिया गया ऐसे कानून बनाए गए जिससे लोगों की समस्याओं का समाधान हो सके फिर भी आज ऐसा माहौल है जिसमें प्रजा बेरोजगारी भ्रष्टाचार महंगाई और सबसे बड़ा नफरती माहौल में जीने के लिए मजबूर हो रही है। अगर हम सरकार चुनते वक्त इन सब बातों का ध्यान रखते हैं क्या हमारे हालात ऐसे होते सोचने की बात है बेरोजगारी चरम सीमा पर है फिर भी सरकार कह रही है सब कुछ ठीक है और बड़े दुख की बात है की लोग भी कह रहे हैं सब कुछ ठीक है ।अगर ठीक है तभी तो सत्ता में बार-बार चुन के आ रही है। महंगाई इतनी है की सब्जियों में अक्सर एक सब्जी ऐसी होती है जो आपके रसोई के बजट को गड़बड़ कर देते हैं इससे साफ दिखता है कि भ्रष्टाचार है कभी टमाटर तो कभी प्याज तो कभी आलू इन सब चीज का भाव अक्सर ऐसे बढ़ाया जाता है की लोगों का ध्यान पता ही ना चले कि कौन सी चीज महंगी हो गई। यह बात सिर्फ सब्जियों में नहीं आप घर के सारे सामान में यह चीजें देखने को मिलेगी आज महंगाई इतनी है की आम जनमानस का बजट पूरी तरीके से हिला पड़ा है इसका एक कारण यह भी है की महंगाई तो है पर लोगों की आए वही की वही है। जिससे वह अपना दैनिक चीजों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं फिर भी वह खुश है ।इसीलिए तो वह सत्ता में बार-बार चुन के शीर्ष पर बैठा रहे हैं।
भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है जिस पर सभी सरकार कहती है कि हम आएंगे तो भ्रष्टाचार पूरी तरीके से खत्म कर देंगे। क्या भ्रष्टाचार खत्म डायरेक्ट बैलेंस ट्रांसफर से खत्म हो गया आज जो भी सरकार की आवास शौचालय कि जो नीतियां रही क्या 100% ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो यह बात कहेगा कि मैंने अपने आवास या शौचालय के लिए अतिरिक्त रकम नहीं दी। अगर हम सुरक्षा की बात करें तो क्या आम जनमानस अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा है आए दिन हम देखते हैं बलात्कार चोरी डकैती छिनायती जैसे अपराध हो रहे हैं। हर 5 साल के बाद लोकतंत्र हमें यह हक देता है की हम ऐसी सरकार चुनें जो हमारी रक्षा करें पर हम हमेशा की तरह विफल हो रहे हैं।
संतोष त्रिपाठी
राजनीतिक विश्लेषक




